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By vk sihag जानिए मकर संक्रांति पर क्यों खाते हैं तिल-गुड़ के लड्डू
भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। त्योहारों की बात हो और मिठाई न हो ऐसा तो हो नहीं सकता। हर त्योहार पर विशेष पकवान बनाने व खाने की परंपराएं भी हमारे यहां प्रचलित हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से तिल व गुड़ के पकवान बनाने व खाने की परंपरा है। कहीं तिल व गुड़ के स्वादिष्ट लड्डू बनाए जाते हैं तो कहीं चक्की बनाकर तिल व गुड़ का इनका सेवन किया जाता है। तिल व गुड़ की गजक भी लोगों को खूब भाती है। मकर संक्रांति के पर्व पर तिल व गुड़ का सेवन करने के पीछे भी वैज्ञानिक आधार है।
सर्दी के मौसम में जब शरीर को गर्मी की आवश्यकता होती है तब तिल व गुड़ के व्यंजन यह काम बखूबी करते हैं। तिल में तेल की प्रचुरता रहती है जिसका सेवन करने से हमारे शरीर में पर्याप्त मात्रा में तेल पहुंचता है जो हमारे शरीर को गर्माहट देता है। इसी प्रकार गुड़ की तासीर भी गर्म होती है। तिल व गुड़ को मिलाकर जो व्यंजन बनाए जाते हैं वह सर्दी के मौसम में हमारे शरीर में आवश्यक गर्मी पहुंचाते हैं। यही कारण है कि मकर संक्रांति के अवसर पर तिल व गुड़ के व्यंजन प्रमुखता से खाए जाते हैं।
अन्ना का अनशन: प्रारंभ से अंत तक एक नज़र
सरकार में बैठे लोगों को डर था कि रामलीला मैदान की भीड़ से उठकर कोई अन्ना उनकी सत्ता न हथिया ले। विपक्ष भयभीत था कि संसद या कतरे-ब्योंते मंचों पर जनता की बात कहने का उनका मुखौटा न छिन जाए।इसलिए दोनों एक हो गए।
अन्ना की शर्तो को प्रस्ताव बनाकर पारित कर दिया। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। ये बात और है कि ज्यादातर सांसद इस आंदोलन को संसद की संप्रभुता पर हमला बताते रहे लेकिन सही मायनों में यही जनतंत्र की मजबूती है।
बातचीत के दौर
23 अगस्त : पहली बार सरकार से सीधी बात।
नतीजा : गतिरोध कायम।
24 अगस्त : कोई वादा करने से सरकार का इनकार। सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने अनशन खत्म करने की अपील की। विलासराव देशमुख ने अन्ना से बातचीत की।
नतीजा : टीम अन्ना ने कहा हमारे साथ धोखा हुआ है। कल तक हमें सुन रहे थे। आज वे हमें डांट रहे हैं।
25 अगस्त: अन्ना की प्रधानमंत्री को चिट्ठी तीन मुद्दों पर संसद में चर्चा हो तो अनशन खत्म करने का वादा।
नतीजा : सरकार ने लोकपाल से जुड़े चार विधेयकों पर चर्चा का आश्वासन दिया।
क्या हुए षड्यंत्र?
>घर से निकलते ही अन्ना गिरफ्तार।
>तिहाड़ जेल भेजा।
>अनशन करने पर दसियों शर्ते।
>नौ दिन तक बातचीत नहीं।
>सरकार ने बार-बार स्टैंड बदला।
>पहले मांगों पर सहमति जताई, फिर मुकर गई।
>कई मसौदे मंगाए ताकि अन्ना का प्रस्ताव कमजोर हो।
>टीम अन्ना में कई बार फूट डालने की कोशिश।
>टीम अन्ना की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
कैसे टूटा गतिरोध?
>विपक्ष के अन्ना के समर्थन में खड़े होने से सरकार बातचीत के लिए दबाव में आई।
>खुद के भ्रष्टाचार समर्थक साबित होने का डर।
>शनिवार को आपात संसद सत्र बुलाकर चर्चा।
क्यों डरी सरकार?
>प्रधानमंत्री, सांसदों के घरों का घेराव हो रहा था
>संसद तक अन्ना समर्थक पहुंच गए
>30 तारीख से जेल भरो आंदोलन का डर
क्यों माना संसद पर हमला?
>कानून बनाने का हक केवल सांसदों का, कोई दूसरा दबाव डालकर कैसे मनचाहा कानून बनवा सकता है।
>जनसमर्थन से अन्ना हजारे और टीम के चुनकर संसद में आने की संभावना ।
पूरी जीत होना बाकी है: अन्ना हजारे
"यह जनलोकपाल की आधी जीत है। पूरी जीत बाकी है। ..और यह जो आधी जीत है वह देशभर के भाइयों, बहनों, युवाओं, बच्चों और बच्चियों की जीत है। प्रस्ताव पारित करने के लिए संसद का धन्यवाद। सांसदों का धन्यवाद। मैं अपना अनशन सुबह 10 बजे तोडूंगा। आप सब जश्न मनाएं लेकिन शांति से।"
20 साल से आंदोलन ही आंदोलन
>1991 में भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन की शुरुआत रालेगांव सिद्धि में।
>9 अगस्त 2003 से 17 अगस्त 2003 तक कांग्रेस-एनसीपी सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल की। मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जांच समिति बनाई, जिसकी रिपोर्ट पर चार मंत्रियों की कुर्सी गई।
>महाराष्ट्र में सूचना का अधिकार कानून लागू करने के लिए आंदोलन छेड़ा, जिसे बाद में केंद्र सरकार ने 2005 में अपनाया।
>9 अगस्त 2006 को सूचना का अधिकार कानून में संशोधन के खिलाफ भूख हड़ताल की, जो 19 अगस्त 2006 में खत्म हुई। सरकार ने संशोधन रद्द कर दिया।
>अनाज से बनी शराब पर प्रतिबंध के लिए शिरडी में 5 दिन की भूख हड़ताल। सरकार ने 20 अगस्त 2009 को सरकार ने प्रतिबंध लगाया।
अन्ना की शर्तो को प्रस्ताव बनाकर पारित कर दिया। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। ये बात और है कि ज्यादातर सांसद इस आंदोलन को संसद की संप्रभुता पर हमला बताते रहे लेकिन सही मायनों में यही जनतंत्र की मजबूती है।
बातचीत के दौर
23 अगस्त : पहली बार सरकार से सीधी बात।
नतीजा : गतिरोध कायम।
24 अगस्त : कोई वादा करने से सरकार का इनकार। सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने अनशन खत्म करने की अपील की। विलासराव देशमुख ने अन्ना से बातचीत की।
नतीजा : टीम अन्ना ने कहा हमारे साथ धोखा हुआ है। कल तक हमें सुन रहे थे। आज वे हमें डांट रहे हैं।
25 अगस्त: अन्ना की प्रधानमंत्री को चिट्ठी तीन मुद्दों पर संसद में चर्चा हो तो अनशन खत्म करने का वादा।
नतीजा : सरकार ने लोकपाल से जुड़े चार विधेयकों पर चर्चा का आश्वासन दिया।
क्या हुए षड्यंत्र?
>घर से निकलते ही अन्ना गिरफ्तार।
>तिहाड़ जेल भेजा।
>अनशन करने पर दसियों शर्ते।
>नौ दिन तक बातचीत नहीं।
>सरकार ने बार-बार स्टैंड बदला।
>पहले मांगों पर सहमति जताई, फिर मुकर गई।
>कई मसौदे मंगाए ताकि अन्ना का प्रस्ताव कमजोर हो।
>टीम अन्ना में कई बार फूट डालने की कोशिश।
>टीम अन्ना की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
कैसे टूटा गतिरोध?
>विपक्ष के अन्ना के समर्थन में खड़े होने से सरकार बातचीत के लिए दबाव में आई।
>खुद के भ्रष्टाचार समर्थक साबित होने का डर।
>शनिवार को आपात संसद सत्र बुलाकर चर्चा।
क्यों डरी सरकार?
>प्रधानमंत्री, सांसदों के घरों का घेराव हो रहा था
>संसद तक अन्ना समर्थक पहुंच गए
>30 तारीख से जेल भरो आंदोलन का डर
क्यों माना संसद पर हमला?
>कानून बनाने का हक केवल सांसदों का, कोई दूसरा दबाव डालकर कैसे मनचाहा कानून बनवा सकता है।
>जनसमर्थन से अन्ना हजारे और टीम के चुनकर संसद में आने की संभावना ।
पूरी जीत होना बाकी है: अन्ना हजारे
"यह जनलोकपाल की आधी जीत है। पूरी जीत बाकी है। ..और यह जो आधी जीत है वह देशभर के भाइयों, बहनों, युवाओं, बच्चों और बच्चियों की जीत है। प्रस्ताव पारित करने के लिए संसद का धन्यवाद। सांसदों का धन्यवाद। मैं अपना अनशन सुबह 10 बजे तोडूंगा। आप सब जश्न मनाएं लेकिन शांति से।"
20 साल से आंदोलन ही आंदोलन
>1991 में भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन की शुरुआत रालेगांव सिद्धि में।
>9 अगस्त 2003 से 17 अगस्त 2003 तक कांग्रेस-एनसीपी सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल की। मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जांच समिति बनाई, जिसकी रिपोर्ट पर चार मंत्रियों की कुर्सी गई।
>महाराष्ट्र में सूचना का अधिकार कानून लागू करने के लिए आंदोलन छेड़ा, जिसे बाद में केंद्र सरकार ने 2005 में अपनाया।
>9 अगस्त 2006 को सूचना का अधिकार कानून में संशोधन के खिलाफ भूख हड़ताल की, जो 19 अगस्त 2006 में खत्म हुई। सरकार ने संशोधन रद्द कर दिया।
>अनाज से बनी शराब पर प्रतिबंध के लिए शिरडी में 5 दिन की भूख हड़ताल। सरकार ने 20 अगस्त 2009 को सरकार ने प्रतिबंध लगाया।
देश को जगाने..सरकार को हिलाने वाले 'अन्ना' की जीवनी
अन्ना हजारे का असली नाम किसन बापट बाबूराव हजारे (प्यार से लोग अन्ना कहते) हैं।
हजारे का जन्म 15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भीनगर गांव में हुआ। पिता का नाम बाबूराव हजारे मां का नाम लक्ष्मीबाई हजारे है। अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे।
अन्ना का पैतृक गांव अहमद नगर जिले में स्थित रालेगन सिद्धि में है। हजारे के दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के 6 भाई हैं। परिवार में व्याप्त आर्थिक तंगी को देखते हुए अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। यहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की।
कठिन हालातों में परिवार को देख कर उन्होंने परिवार का बोझ कुछ कम करने की सोंची। और वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रूपए महीने की पगार में काम करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने खुद फूलों की दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान युवाओं को सेना में शामिल होने की सरकार की अपील पर वे मराठा रेजीमेंट में बतौर ड्राइवर नियुक्त हुए। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनकी पूरी यूनिट शहीद हो गई। गोली अन्ना को भी लगी, लेकिन बच गए। जिस ट्रक को अन्ना चला रहे थे, उस पर गोलाबारी हुई थी।
इस घटना के 13 साल बाद सेना से रिटायर हुए लेकिन अपने पैतृक गांव महाराष्ट्र के अहमदनगर में भीगांव नहीं गए। पास के रालेगांवसिद्धि में रहने लगे। वे कहते हैं कि समाजसेवा की प्रेरणा उन्हें स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक से मिली। उन्होंने अपना जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दिया।
कौन हैं अन्ना हजारे
महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास भिंगर गांव में 15 जनवरी 1940को बाबूराव हजारे की पत्नी लक्ष्मीबाई ने पहले पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम रखा गया किसन। जिन्हें हम आज अन्ना हजारे के नाम से जानते हैं। अन्ना के दादा भिंगर में ब्रिटिश सेना में नौकरी करते थे और उनके पिता वहीं के एक आयुर्वेदिक आश्रम में छोटा-मोटा काम करते थे।
1945 में अन्ना के दादा की मृत्यु हो गई, लेकिन 1952 तक अन्ना का परिवार भिंगर मे ही बसा रहा। छह बच्चों के परिवार को पालना जब अन्ना के पिता को मुश्किल लगने लगा, तब वह 1952 में अपने पुश्तैनी गांव रालेगांव सिद्धी वापस आ गए। लेकिन हजारे परिवार की मुश्किलें फिर भी कम नहीं हुईं। यहां आकर भी उनका संघर्ष जारी रहा। अन्ना की चाची, जिन्हें कोई संतान नहीं थी, उन्हें अपने साथ मुंबई ले आईं।
मुंबई आकर छह वर्ष के अन्ना ने स्कूल जाना शुरू किया और सातवीं कक्षा तक की अपनी पढ़ाई पूरी की। उसके बाद उन्होंने अपने परिवार के खस्ता हालत को देखते हुए मुंबई के दादर इलाके में फूल बेचना शुरू किया। फूलों का धंधा चल पड़ा और वहां अन्ना ने एक दुकान खोल ली। बढ़ते कारोबार में हाथ बंटाने के लिए उन्होंने अपने दो भाइयों को भी गांव से बुला लिया। उनके द्वारा धंधा संभालने के बाद 1963 में अन्ना अपने दादा के नक्शेकदम पर चलते हुए भारतीय फौज में बतौर वाहन चालक के रूप में भर्ती हो गए।
सन् 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सेक्टर में दुश्मनों के गोलियों से बच निकलने वाले अन्ना अकेले वाहन चालक थे। 1975 में अन्ना फौज से स्वेच्छा से निवृत्ति लेकर वापस अपने गांव रालेगांव सिद्धी आए और वहां के लोगों को संगठित कर वॉटर द्रोड मैनेजमेंट, दारू बंदी, सामूहिक विवाह, छुआछूत, ग्रामीण विकास और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छ़ेडकर रालेगाव सिद्धी को एक मॉडल गांव के रूप में विकसित किया। उनके इस कामों के लिए भारत सरकार ने उन्हे पद्मश्री और पद्मभूद्गाण जैसे सम्मानों से नवाजा।

